नारी कितने रूप तेरे !
एक अस्तित्व है, एक जान है ;
एक आत्मा है, पहचान है;
एक  ज्वाला है , एक अग्नि है ,
तू अब खुद को पहचान ले |

क्यों  है यहाँ बेबस पड़ी ?
उठ बेडियों को तोड़ दे ;
नज़रें मिला इस दुनिया से ;
खुल के ज़रा तू सांस ले |

है जननी तू ,तू पूज्य है ;
है सबला तू ,फिर क्यों डरे?
संहार कर इस चुप्पी का ;
हर बाधा को आवाज़ दे …

तू निडर हो बस आगे बढ़ ;
काटों को अब तू पार कर ;
लहू में रंगे इन पैरों से
तू  दौड़ चल अपनी डगर |

तेरे कदमो के निशां से ही
नए रास्ते फिर बनेंगे …
फिर इन अपाहिज बंधनों को
तोड़ कोई बाहर आएगा …