नाज़

हे वस्त्र ! तुम्हे हो नाज़ की तुम जा लगे
                              जवानों के तन पर |
हे शस्त्र ! तुम्हे हो नाज़ की तुम जा लड़े
                                 देश की रक्षा कर |
हे पुष्प !तुम्हें हो नाज़ की तुम जा चढ़े
                               शहीदों के शव पर |
हे वीर !तुम्हें हो नाज़ की तुम ढह गए
                                 कर्म की पूजा कर |

ऐसे सपूत ऐसे रक्षक नहीं जन्मे है किसी देश में ,

हिन्दू हो या मुस्लिम रहते है सब एक ही परिवेश में ;

है नमन ऐसी माताओं को जिसने है इनको जन्म दिया

और गर्व है उनके पुत्रों पर जिसने देश हित कर्म किया !!

Note: I wrote this poem in 1999 when I was in 9th std …. This is my first creation !! I wrote it for 15th august function at school . Hope you all will like it and if any mistakes are there then please let me know!!

शुक्रिया ए ज़िन्दगी!!

जाने कहाँ से ,
यूहीं बिन बात, 
कोई ख्याल आ रहा है|

खिड़कियों से बहती ठंडी भीनी हवा के साथ
कोई पैगाम आ रहा है |

एक आहट सी हुयी जो 
तो दिल चौक गया,
हँसते हुए मन फिर खुद को सम्भाल रहा है |

खोयी सी आँखें ढूँढती फिरती है जाने क्या?
इस सवाल सा ना कोई सवाल रहा है …

उस ऊपर वाले का ही है ये करम,
कुछ ना होने पर भी सब होने का एहसास हो रहा है |

खुशियों की जैसे बारिश हो रही हो मेरे आँगन
सोंधी सी खुशबु से दिल का हर कोना बाग़ हो रहा है |

ज़िन्दगी तू जो दोस्त बन गयी है मेरी,
ऐसा अनोखा तो ना कोई दूजा साथ रहा है |

नयी मंज़िल

फिर है कलम हाथों मे मेरे
फिर आज कुछ लिखने को दिल करता है ;

अपनी आत्मा से दो बातें करने
अपनी ही परछाई से मिलने को दिल करता है |

कदम खुद ही बढ़ चले है
दूर है एक राह अंजान सी

पर
दोस्त तू ही बता
कौन अंजान ना था यहाँ!

हर मुलाकात से पहले,
हर पहली बात से पहले,
सबसे अंजान ही तो थी मै |

तो
क्यूँ  डरूँ  आज उस राह जाने से ?
क्यूँ रोकू अपने कदम
एक नयी मंज़िल पाने से?

ठहरी कलम फिर चल पड़ी है
अपनी नयी पहचान बनाने!!

इक सवाल

चाँद की रौशनी में तुम हो
रात के सन्नाटे में भी तुम

रुकी हुई सी हवा भी यही कहती है
इसकी हर आहट में हो तुम

बस मैं ही तो हूँ यहाँ
पर इस अकेलेपन में भी तुम

दूर कही से एक आवाज़ आती है
उस आवाज़ की पहचान भी तुम

ख्यालों के हर पहर में तुम हो
सपनो की हर गली में हो तुम

भोर की पहली किरन में
सूरज की उगती लालिमा में भी तुम

हर जगह हर घडी बस
तुम्हारा ही तो वजूद है
अब तो बता दो मुझे
आखिर कौन हो तुम?

दिल की आवाज़

खामोश  क्यूँ  हो?
सुनो  तो, चुपके से दिल  कुछ  कहता  है ,
धीरे से  एक  छोटा  सा  इशारा  करता  है
बस ज़रूरत  है  इसे  समझने  की |
वक़्त  किसी  का इंतज़ार नहीं  करता ;
रोक  लो  इसे |
सच  को  सच  मान  कर
मन  की  सारी  बातें  जान  कर,
दिल के सारे राज़ खोल  दो
लफ्जों  की ज़रूरत हमें  कब थी ,
बस दिल से ही तुम एक बार सब कुछ बोल दो|

Someone

Whenever I am alone I am silent …..
I want to talk to someone ;
Someone who knows me ;
Someone who understands me;
Someone who likes me
And someone who cares for me.
But this someone, whom I talk;
Doesn’t know my feelings but knows me.
Doesn’t understand me but likes me
Doesn’t say anything but cares for me.
Hope that someone will say
Something some day to me!!!!!

VARIOUS SHADES OF AN INDIAN WOMAN

  
  

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Information about Capt.

What is Right?

Everyday I wake up I recheck my routine n schedule for the day…Things I have to do and I want to do… But as Practical Life has no ideal case… Some of the things don’t go that way. I recollect them and add them up in the next day’s schedule. People with whom I am attached are my first priority , Inspite of my place in their life.

I don’t know I should call it bad or good, but its my habit to take care of people around,I can’t see them unhappy … and do my best to make them feel good…But may be I am over possessive or so ..coz this time I felt that people are getting irritated , may be they don’t want my interference or whatsoever , but as I can’t help it I will keep doing what I feel I should , of course with a Sorry !!

And I would never speak out what ‘they’ really mean to me !! Coz if my affection n love is enough and true they will realize it someday or may be they just ignore it off..I DON’T CARE!!

I will make all efforts to let them feel light and good ,wiping up my hidden tears!!

बादल का वो एक टुकडा

 

बादल का वो एक टुकडा ,
मुझसे कुछ बातें करता है ;
कुछ सुनाता कुछ बताता,
वो मुझे जानना चाहता है |

कर कई इशारे वो मुझको ,
कई भेद खोलना चाहता है ;
कभी धूप तो कभी छांव कर ,
मेरे साथ खेलना चाहता है |

जानता है शायद वो मुझको
कोई रिश्ता उसका मुझसे है ;
पर लगता कभी कभी मुझको
शायद तनहा सा खुद से है |

कुछ देर यूँ ही अठखेलियाँ कर ,
वो कुछ थका सा लगता है ;
अब थम कर मेरे पास ही वो ,
थोडा संजीदा लगता है |

एक तेज हवा के झोके ने ,
जैसे उसको झकझोर दिया ;
वो थमा संभला बहुत ,
पर इस पर भी नाकाम रहा |
धीरे धीरे अपने गम को
वो अश्कों में बहाने लगा |

मैं भीग रही उस बारिश में
और मन में ये सवाल उठता है,
उस बादल को उदास को देख कर
दिल मेरा क्यों दुखता है ?

है कोई रिश्ता उससे मेरा
फिर यही एहसास होता है !

कुछ देर बाद जब बारिश थमी
मैं फिर उसे ढूँढने लगी

पर वो तो चला गया था,

कुछ अधूरे सवाल छोड़ कर …

दिल से मैंने मेरे पूछा
कौन था वो क्यूँ आया था ?
दिल ने कहा -
मेरे प्यारे सुन!
वो तुझे जगाने आया था ;
जिस बारिश में भिगोया है आज तुझे ,
कभी तेरे किसी अपने को भिगाया था !!