
भीगी तो नहीं है पलकें ,
पर हाँ नम हैं आँखें आज िफर;
दर्द तो नहीं है िदल में कोई
पर एक एहसास सा है आज िफर;
उस ऊंचे आकाश को देख कर
िफर उड़ने को िदल क्यों करता है ?
इस फैली धरती को देख कर
इसमें समाने को िदल क्यों करता है ?
ओस की बूंदों पर ,फूलों के रंगो में
मैं कुछ ढूँढने लगी हूँ !
बािरश की िरमिझम में ,तारों की िटमिटम में ,
मैं कुछ खोने सी लगी हूँ !
सच तो नही शायद पर िफर भी िदल ये पूछता है ,
ये उड़ना ये खोना ,ये आँखों का नम होना ..
कहीं ये कोई इशारा तो नहीं !!

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