एक एहसास

भीगी तो नहीं है पलकें ,
पर हाँ नम हैं आँखें आज िफर;
दर्द तो नहीं है िदल में कोई
पर एक एहसास सा है आज िफर;

उस ऊंचे आकाश को देख कर
िफर उड़ने को िदल क्यों करता है ?
इस फैली धरती को देख कर
इसमें समाने को िदल क्यों करता है ?

ओस की बूंदों पर ,फूलों के रंगो में
मैं कुछ ढूँढने लगी हूँ !
बािरश की िरमिझम में ,तारों की िटमिटम में ,
मैं कुछ खोने सी लगी हूँ !

सच तो नही शायद पर िफर भी िदल ये पूछता है ,
ये उड़ना ये खोना ,ये आँखों का नम होना ..
कहीं ये कोई इशारा तो नहीं !!

गम

गम अपने िकसी से कह न सके,

बस मन में ही उनको समेटे रहे !

जब भी िकसी ने उनको कुरेदा

आंसू बन कर बहने लगे

आंसुओं ने भी न साथ िदया

आँखें अब नम होती ही नहीं

गम पहले आँखों से जाते थे

पर अब तो वो रहते हैं वहीं !