वास्तविकता
February 25, 2008 — Tanu Shreeआज हम खुशियाँ तो मानते है
पर उनका क्या जो धूप में जल रहे है ?
आज हम स्वतंत्र तो कहलाते है ,
पर उनका क्या जो भूखे पेट सो रहे है ?
कितना ही क्यों न हम खुद को सफल कह ले
फिर भी एक अबोध को बालिका वधु बना रहे है ?
क्या पैसा ही है हम सबकी एक मात्र आशा ?
क्या कुछ भी नहीं रह गयी प्रेम की मीठी भाषा ?
क्यों मनुष्य हो रहा है मनुष्य का ही दुश्मन ?
क्या इसी उद्देश्य से दिया उसने हमे ये जीवन ?
ये सारे प्रश्न क्या हमारी सभ्यता को दर्शाते है ?
या ये झूठ ही हमारे समाज में वास्तविकता कहलाते है !
